
परिचय
भारत में वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है जो हर पाँच वर्षों में केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व वितरण की सिफारिश करती है। 16वां वित्त आयोग, जिसकी अध्यक्षता अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने की, ने अपनी रिपोर्ट संसद में 1 फरवरी 2026 को पेश की। यह रिपोर्ट 2026-27 से 2030-31 तक की अवधि के लिए लागू होगी।
प्रमुख सिफारिशें
1. राज्यों का कर हिस्सा
- राज्यों को केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में 41% हिस्सा मिलेगा, जो 15वें आयोग की सिफारिशों के समान है।
- यह हिस्सा सेस, अधिभार और संग्रह लागत को घटाकर तय किया गया है।
2. दक्षिणी राज्यों को अधिक लाभ
- कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु को अतिरिक्त ₹18,330 करोड़ का आवंटन मिलेगा।
- इन राज्यों ने विकास संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है।
- GDP में योगदान को 10% वेटेज के रूप में शामिल किया गया है।
3. हिंदी पट्टी राज्यों को कम हिस्सा
- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को पिछले आयोग की तुलना में कम हिस्सा मिलेगा।
- उदाहरण: मध्य प्रदेश का हिस्सा 7.85% से घटकर 7.35% हो गया है।
जनसंख्या और विकास का नया दृष्टिकोण
- 15वें आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण को पुरस्कृत किया था।
- 16वें आयोग ने पहली बार यह माना कि कुछ राज्यों में जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि घटती प्रजनन दर और श्रम की कमी चिंता का विषय है।
- यह संकेत देता है कि भारत “अमीर बनने से पहले बूढ़ा” हो सकता है — एक वैश्विक नीति चिंता।
राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव
- आयोग ने “अधिकार आधारित” से “अनुपालन आधारित” वित्तीय संघवाद की ओर संकेत दिया है।
- इससे राज्यों को विकास प्रदर्शन और वित्तीय अनुशासन के आधार पर अधिक या कम संसाधन मिल सकते हैं।
निष्कर्ष
16वां वित्त आयोग भारत के राजकोषीय संघवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह न केवल राज्यों के कर हिस्से को निर्धारित करता है, बल्कि विकास के नए मानकों को भी स्थापित करता है। दक्षिणी राज्यों को अधिक लाभ और हिंदी पट्टी राज्यों को कम हिस्सा मिलना इस बात का संकेत है कि अब प्रदर्शन और योगदान को प्राथमिकता दी जा रही है।